Tuesday, May 14, 2019

हिमाचल प्रदेशः क्या प्रचार के बहाने कांग्रेस का ही नुक़सान कर रहे वीरभद्र?

हिमाचल प्रदेश की चार लोकसभा सीटों पर आख़िरी चरण के तहत 19 मई को होने वाले मतदान के लिए प्रचार अभियान चरम पर है.

बीजेपी जहां मोदी के नाम पर चुनाव लड़ रही है वहीं कांग्रेस पिछले पांच साल में हिमाचल को लेकर कोई काम न होने की बात कहते हुए जनता के बीच जा रही है.

2014 में सभी चारों सीटें जीतने वाली बीजेपी ने दो सीटों- शिमला और कांगड़ा में उम्मीदवार बदले हैं जबकि मंडी और हमीरपुर में मौजूदा सांसदों को ही चुनावी मैदान में उतारा है.

उधर कांग्रेस ने चारों सीटों पर पिछले चुनाव में हार का सामना कर चुके उम्मीदवारों की जगह नए चेहरों को मौक़ा दिया है.

कांग्रेस में आंतरिक गुटबाज़ी चरम पर नज़र आ रही है. आलम यह है कि हिमाचल में पार्टी के वरिष्ठतम नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह प्रचार के दौरान ही अपनी ही पार्टी के नेताओं पर प्रहार और व्यंग्य करते नज़र आ रहे हैं.

चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने हिमाचल में अपने अध्यक्ष को बदला था और सुखविंदर सिंह सुक्खू की जगह कुलदीप सिंह राठौर को जिम्मेदारी दी थी.

मगर उनकी ताज़पोशी वाले दिन ही वीरभद्र सिंह और सुखविंदर सिंह सुक्खू के समर्थक आपस में भिड़ गए थे और कुछ को चोटें भी आई थीं.

इसके अलावा वीरभद्र सिंह, कौल सिंह ठाकुर, जीएस बाली और मुकेश अग्निहोत्री जैसे नेताओं का चुनाव न लड़ना भी प्रदेश में चर्चा में रहा.

इन सब बातों के बीच कांग्रेस आख़िर किस तरह से चुनाव लड़ रही है, यह समझने के लिए हमने बात की कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर से. राठौर कहते हैं कि वह केंद्र और राज्य सरकार की नाकामियों को जनता के बीच ले जा रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी ने सबसे पहले चारों सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा की थी, जबकि कांग्रेस में काफ़ी दिनों तक ऊहापोह की स्थिति बनी रही. भ्रम की यह स्थिति चारों सीटों पर ही बनी रही.

वीरभद्र सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं से चुनाव लड़ने की उम्मीद की जा रही थी जो मंडी से छह बार लोकसभा पहुंच चुके हैं. पूर्व कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कौल सिंह ठाकुर का नाम भी चल रहा था मगर कई दिनों तक चली अटकलों के बाद भाजपा छोड़ कांग्रेस का दामन थामने वाले पूर्व दूरसंचार मंत्री पंडित सुखराम के पोते आश्रय शर्मा को टिकट दे दिया गया.

क्या वजह रही जो बड़े नेता चुनाव लड़ने से पीछे हटते नज़र आए? इसपर कुलदीप राठौर ने कहा, "बीजेपी की कोर कमेटी की बैठक में चारों सांसदों को टिकट देने का फैसला किया था मगर दो जगह उन्होंने प्रत्याशी बदल दिए. इन्होंने हमारी लोकप्रियता और संगठनात्मक शक्ति के कारण उम्मीदवार बदल दिए. इन्होंने पहले ही हार मान ली. कांगड़ा, मंडी और शिमला में कोई समस्या नहीं हुई, हमीरपुर में ज़रूर समय लगा. मगर वहां हमने अच्छा प्रत्याशी उतारा है."

कांग्रेस ने विधायक रामलाल ठाकुर को टिकट दिया है जो हमीरपुर सीट से तीन बार लोकसभा चुनाव हार चुके हैं.

जो आश्रय शर्मा पहले बीजेपी से टिकट मांग रहे थे और जिनके पिता बीजेपी के न सिर्फ विधायक बल्कि सरकार में मंत्री भी थे, उन्हें कांग्रेस में शामिल करके टिकट दे देने से क्या पार्टी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा नहीं हुई? इसका नुक़सान नहीं होगा?

इसके जवाब में कुलदीप राठौर ने कहा कि पार्टी चाहती थी कि वीरभद्र या कौल सिंह चुनाव लड़ें मगर उन्होंने इनकार कर दिया.

उन्होंने कहा, "हम चाह रहे थे वीरभद्र चुनाव लड़ें मगर उन्होंने इनकार किया. उन्होंने कहा कि बहुत चुनाव लड़ लिए, अब मैं विधायक हूं तो पार्टी काम करना चाहूंगा. फिर हम कौल सिंह को चाह रहे थे मगर वह भी तैयार नहीं हुए, उन्होंने कहा कि संगठन के लिए काम करूंगा. सुखराम जी का तो पूरा जीवन कांग्रेस में बीता है. उन्हें लाकर हमने मंडी में कांग्रेस को मजबूत किया है और आधार खिसका था, उसे वापस पाया है. मुझे नहीं लगता कि इससे किसी कार्यकर्ता को आपत्ति है."

इस चुनाव को कांग्रेस के लिए काफ़ी अहम माना जा रहा है और अध्यक्ष राहुल गांधी इसे महत्वपूर्ण लड़ाई कह चुके हैं. ऐसे में एक-एक सीट जीतना काफ़ी अहम हो जाता है. जिस समय दिग्गज और अनुभवी नेताओं की पार्टी को सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, उनके चुनाव न लड़ने से क्या ऐसा नहीं लगता कि जीत को लेकर उनमें विश्वास की कमी थी?

राठौर कहते हैं, "ऐसा नहीं मानता. वीरभद्र सिंह और कौल सिंह ने बहुत चुनाव जीते हैं. हर नेता की प्राथमिकता होती है. हमने जो उम्मीदवार उतारा है, वह युवा है. इससे प्रदेश में भी अच्छा संदेश गया कि हमने युवा को मौक़ा दिया है."

वीरभद्र के बयानों का नुक़सान तो नहीं?

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वीरभद्र सिंह के बयान चर्चा में हैं. वह प्रचार के दौरान अलग-अलग मंचों से ऐसी बातें कह चुके हैं, जिनके वीडियो भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस पर निशाना साधने के लिए इस्तेमाल कर रही है.

पंडित सुखराम और वीरभद्र के बीच पुरानी प्रद्वंद्विता रही है. सुखराम के पोते आश्रय को टिकट मिलने के बाद वीरभद्र को स्टार प्रचारक होने के नाते प्रचार करना पड़ रहा है. इस दौरान उन्होंने खुले मंच से कहा कि वह सुखराम को कभी माफ़ नहीं करेंगे.

इसके बाद हमीरपुर में उन्होंने पूर्व कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष की ओर देखकर कहा- अब प्रदेश कांग्रेस का गंद साफ़ हो गया. फिर उन्होंने शिमला के उम्मीदवार धनीराम शांडिल को 'पुराना पापी' बता दिया जो बीच में कांग्रेस छोड़कर सुखराम की पार्टी रही हिमाचल विका कांग्रेस में चले गए थे.

यही नहीं, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में तो वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा पर व्यंग्य करते दिखे कि वह राज्यसभा के रास्ते पर ही चले हैं, उन्हें चुनाव लड़ने का अनुभव नहीं.

प्रचार के दौरान अपने ही नेताओं को निशाना साधना कहीं अपने समर्थकों को कोई ख़ास संदेश देने की कोशिश तो नहीं है?

इसके जवाब में राठौर ने , "मुझे नहीं लगता. हो सकता है कि थोड़ी इस तरह की बात हुई हो मगर वीरभद्र कांग्रेस पार्टी और आश्रय का समर्थन कर रहे हैं, पूरे प्रदेश में उम्मीदवारों के लिए प्रचार कर रहे हैं. वीरभद्र के बेटे ने भी आश्रय के साथ दौरे किए हैं."

बीजेपी के वरिष्ठ नेता शांता कुमार ने वीरभद्र के ऐसे बयानों पर चुटकी लेते हुए कहा था कि वह प्रदेश में बीजेपी की मदद कर रहे हैं. इस पर कुलदीप कहते हैं, "मुझे नहीं पता वह ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं. मुझे तो तरस आता है उनपर, वह खुद चुनाव लड़ना चाहते थे मगर पार्टी ने उन्हें ऐन मौक़े पर चुनाव मैदान से बाहर निकाल दिया."

''मोदी जैसी भाषा असुर भी नहीं करते इस्तेमाल''

कुलदीप राठौर सपताल सत्ती के बयानों को दुखत बताते हैं मगर कहते हैं कि इसकी शुरुआत हिमाचल से नहीं हुई बल्कि प्रधानमंत्री भी अपनी भाषा पर संयम खो चुके हैं. जब उनसे पूछा गया कि बीजेपी तो यह आरोप कांग्रेस पर लगा रही है कि पहले राहुल गांधी ने 'चौकीदार चोर है' कहा था, तो कुलदीप बोले- उन्होंने तो चौकीदार चोर कहा, वह अपने ऊपर क्यों ले रहे हैं?

कुलदीप कहते हैं, "बीजेपी के नेता तो नाम लेकर बयान दे रहे हैं. शर्म आनी चाहिए पीएम को जिन्होंने उन राजीव गांधी के बारे में ग़लत शब्द कहे जिन्होंने देश की एकता और अखंडता के लिए प्राण दे दिए. हमारी संस्कृति और हिंदू धर्म में दिवंगत आत्मा के लिए ऐसे शब्द नहीं कहे जाते. मैं तो कहूंगा कि असुर भी ऐसी भाषा इस्तेमाल नहीं करते. हार की हताशा के कारण उनकी ज़ुबान लड़खड़ा रही है."

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